Bhagvad Gita - Lesson 40 - Suggested Answers

Q1) What is better, to renounce work or work with devotion ?

Krishna says, renunciation of work and work in devotion both together lead to the path of liberation, as such both are good. BUT its better to work in devotional service which is transcendental in nature. One must develop a love for devotional service to Krishna no matter how engrossed he is in sense gratification, only than can he be free from material bondage. Krishna conscious person escapes the result of fruitive action so he need not descend to the material platform, isiliye Krishna consciousness is always superior to renunciation. Renunciation without loving service to Krishna is incomplete

Q2) In shloka 7, what does Lord Krishna say about the devotee who works in devotion?

Krishna says One who works in devotion is a pure soul, controls his mind and senses ,is dear to everyone and everyone is dear to him. Even though always working, such a man is never entangled. That is to say jab koi krishna bhav mey rehta hai tab usey har koi praani pyara hota hai aur baaki logon ko wo bhi pyara lagta hai. This body is the property of Krishna and should therefore be engaged in his service. Krishna conscious log har bandhan se mukt hotey hain aur wo har jagah krisghna ko hi dekhtey hain. One who works in Krishna consciousness is servant to all, he is very dear to everyone and because everyone is satisfied by his work, he is pure in consciousness. His mind and senses are completely controlled, and a man with this senses in control is loved by everyone

Q3) What does Srila Rupa Goswami describe in Bhakti - rasamrta - sindhu ?

Srila Rupa Goswami in Bhakti rasamrta - sindhu says " Eha yasya harer dasiye karmaanaa mansa gira| nikhilaswapyavasthasu jeevan muktah sa uchyatey||" A person in the service of Krishna with his body, mind, intelligence is a liberated person from this material world.He knows that he is not this body and this body does not belong to him.He belongs to Krishna and so does this body. This is the perfect stage of Krishna consciousness.

Q4) What are the teachings of Lord Rishabdev?

Lord Rishabdev said that those who are mad after sense gratification does not know that body is temporary and as such everything associated with this temporary body is also temporary. A person absorbed in Krishna consciousness is so much in the loving service of the Lord that he loses his taste for material sense pleasure altogether. Human body is destructive while soul is eternal.There is no difference between humans and animals when a person is without Krishna consciousness. Maanav jeevan humey hamarey pichley janam k punya karmon se mila hai aur iska sadupyog humey harinaam kirtan se karna chahiye sirf indriya tripti se nahin.


१) कर्म त्यागने और भक्तिपूर्वक कर्म करने, में से कौन अधिक लाभप्रद है ?

मुक्ति के लिए तो कर्म का परित्याग तथा भक्तिमयकर्म दोनों ही उत्तम है किंतु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्ति युक्त कर्म श्रेष्ठ है

२) भगवान कृष्ण श्लोक ७ में भक्तिभाव से कर्म करने वाले भक्तो के विषय में क्या कहते हैं ?

जो भक्ति भाव से कर्म करता है जो विशुद्ध आत्मा है और अपने मन तथा इंद्रियों को वश में रखता है वह सबको प्रिय होता है और सभी लोग उसे प्रिय होते हैं ऐसे व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कभी नहीं बंधता

३) श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृत सिंधु में क्या वर्णन किया है ?

अपने शरीर मन बुद्धि तथा वाणी से कृष्णा भावना मृत में कर्म करता हुआ व्यक्ति इस संसार में भी मुक्त रहता है भले ही वह तथाकथित अनेक भौतिक कार्यकलापों में व्यस्त क्यों ना रहे उसमें अहंकार नहीं रहता क्योंकि वह इस में विश्वास नहीं रखता कि वह भौतिक शरीर है अथवा यह शरीर उसका है वह जानता है कि वह यह शरीर नहीं है और ना यह शरीर ही उसका है वह स्वयं कृष्ण का है और उसका यह शरीर भी कृष्ण की संपत्ति है जब वह शरीर मन बुद्धि वाणी जीवन संपत्ति आदि से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु को जो भी उसके अधिकार में है कृष्ण की सेवा में लगाता है तो वह तुरंत कृष्ण से जुड़ जाता है वह कृष्णा से एक रूप हो जाता है और उस संसार से रहित होता है जिसके कारण मनुष्य सोचता है कि मैं शरीर हूं यही कृष्णा भावना मृत की अवस्था है

४) भगवान ऋषभदेव ने क्या उपदेश दिए ?

ऋषभदेव कहते हैं जो लोग इंद्रिय तृप्ति के पीछे मत हैं वह यह नहीं जानते कि उनका क्लेशों से युक्त यह शरीर उनके विगत साकम कर्मों का फल है यद्यपि यह शरीर नाशवान है किंतु यह नाना प्रकार के कष्ट देता रहता है अतः इंद्रिय तृप्ति के लिए कर्म करना श्रेयस्कर नहीं है जब तक मनुष्य अपने असली स्वरूप के विषय में जिज्ञासा नहीं करता उसका जीवन व्यर्थ रहता है और जब तक वह अपने स्वरुप को नहीं जान लेता तब तक उसे इंद्रिय तृप्ति के लिए सकाम कर्म करना पड़ता है और जब तक वह इंद्रिय तृप्ति कि इस चेतना में फंसा रहता है तब तक उसका देहंतरण होता रहता है भले ही उसका मन से काम करने में व्यस्त रहें और अज्ञान द्वारा प्रभावित हो किंतु उसे वासुदेव की भक्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न करना चाहिए केवल तभी वह भव बंधन से छूटने का अवसर प्राप्त कर सकता है

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